ओशो ने कहा था- 'जबलपुर मेरा पर्वत स्थल, जहाँ मैं सर्वाधिक आनंदित हुआ' - Bhaskar Crime

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ओशो ने कहा था- 'जबलपुर मेरा पर्वत स्थल, जहाँ मैं सर्वाधिक आनंदित हुआ'

ओशो ने कहा था- 'जबलपुर मेरा पर्वत स्थल, जहाँ मैं सर्वाधिक आनंदित हुआ'                                                 भेडाघाट को मानते थे विश्व का सुंदरतम स्थल                                            -सुरेन्द्र दुबे                                                    जबलपुर। विश्वविख्यात ओशो को देहमुक्त हुए 30 साल बीत चुके हैं। आज 19 जनवरी है। वर्ष 1990 में आज ही के दिन शाम 5 बजे उन्होंने पूना कम्यून में अन्तिम सांस ली थी। उस वक्त उनकी आयु 59 वर्ष थी, जिसमें से सर्वाधिक 19 वर्ष वे जबलपुर में रहे। उस समय उनका नाम आचार्य रजनीश हुआ करता था। उन्हें जबलपुर से अतिशय प्रेम था। इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका पहुंचकर जगप्रसिद्ध होने के बाद भी वे जबलपुर को शिद्दत से याद किया करते थे। यहीं एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि जबलपुर मेरा पर्वत स्थल है, जहाँ मैं सर्वाधिक आनंदित हुआ।                                                                      अमेरिका में ऑरेगन स्थित रजनीशपरम में एक प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा था- "जबलपुर में इस जगत का, इस पृथ्वी का एक सुंदरतम स्थल है-भेड़ाघाट। शायद ही पृथ्वी पर इतनी सुंदर कोई दूसरी जगह होगी। यहाँ नर्मदा दो मील तक संगमरमर की पहाड़ियों के बीच से बहती हैं। दोनों तरफ संगमरमर की पहाड़ियां हैं। एक तो संगमरमर की पहाड़ी यानी जैसे हजारों ताजमहल का सौंदर्य इकट्ठा कर दिया गया हो और बीच से नर्मदा का बहाव। इससे बड़ा ही अपूर्व दृश्य उपस्थित होता है।"                                                                                                                                                    ओशो ने इसी संदर्भ में रोचक संस्मरण सुनाते हुए कहा-"एक बार मैं दुनिया घूम चुके अपने एक वृद्ध प्रोफेसर को, जिन्होंने मुझे पढ़ाया था, भेडाघाट दिखाने ले गया। वह शरदपूर्णिमा की रात थी। इस दिन तो नर्मदा के नैसर्गिक संगमरमरी सौंदर्य में कई गुना इजाफा हो जाता है। यही वजह थी कि जीवन में पहली बार भेडाघाट के अनुपम दृश्य को देखकर वे वृद्ध प्रोफेसर एकदम आवाक से रह गए। आनंदातिरेक में उनकी आंखों से आंसू छलकने लगे। वे भाव-विह्वल होकर रोने लगे। जब नौकाविहार शुरु हुआ तो कहने लगे कि यह जो मैं देख रहा हूं, क्या यह सब सच में है? क्योंकि मुझे लगता है कि मैं कोई सपना देख रहा हूं। उन्होंने मांझी से कहा कि नाव को तनिक किनारे तो लगाओ मांझी, मैं इन संगमरमर की पहाड़ियों को छूकर देखना चाहता हूं कि क्या ये सच में हैं? सचमुच शरद पूर्णिमा की रात में भेडाघाट नौसर्गिक सौंदर्य के जादू से भर जाता है। तब सहसा भरोसा ही नहीं होता कि इस पृथ्वी पर एक ही जगह पर इतना अधिक सौंदर्य एकत्र हो सकता है।