फिर मौन क्यों हैं समाज के कर्ता-धर्ता , - Bhaskar Crime

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फिर मौन क्यों हैं समाज के कर्ता-धर्ता ,

विवाह : सामाजिक समस्या

 

  वर्तमान समय में हमारे देश में विवाह की बढ़ती उम्र -एक चिंता व चर्चा का विषय बना हुआ है । 25 से 42 साल तक के युवक - युवतियां कुंवारे हैं , फिर मौन क्यों हैं ? समाज के कर्ता-धर्ता , और तो और साहित्यकारों की भी दृष्टि इस ओर नहीं जाती।कुंवारे बैठे लड़के-लड़कियों* की एक गंभीर समस्या आज सामान्य रुप से सभी समाजों में देखने को मिल जाती है । इसमें उम्र तो एक कारण हैं ही मगर समस्या अब इससे भी कहीं आगे बढ़ गई हैं और वह समस्या है लड़कियां समाज में ज्यादा पढ़ी लिखी हो रही हैं , क्योंकि जब तक उनकी शादी तय नहीं हो जाती तब तक या तो वे अपनी शिक्षा आगे बढ़ाती रहती हैं या फिर कहीं जॉब मिल जाता है तो जॉब करने लगती हैं कभी जॉब छूटने के लालच में अच्छे परिवार अच्छे वध की तलाश में माता-पिता लगे रहते हैं। इसके कारण भी लड़कियों की उम्र ज्यादा बढ़ जाती है। दूसरी तरफ लड़के यदि सरकारी नौकरी में होते हैं तो या तो वह दहेज की वजह से रुके रहते हैं या फिर उनके योग्य लड़कियां नहीं मिल पाती हैं अपने आसपास रिश्तेदारों में ढूंढने पर भी वह संतुष्ट नहीं हो पाते हैं जिसके कारण लड़कों की भी उम्र बढ़ती जा रही है। इससे स्पष्ट हैं कि इस समस्या का उम्र ही एकमात्र कारण नहीं बचा हैं ।
         ऐसे में लड़के लड़कियों के जवां होते सपनों पर न तो किसी समाज के कर्ता - धर्ताओं की नजर हैं और न ही किसी रिश्तेदार और सगे संबंधियों की और ना ही समाज के धर्माचार्य की। समाज को आईना दिखाने वाले साहित्यकार भी  इस विषय पर रचना नहीं करते। जबकि यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है इसके कारण समाज में बहुत सारे विचार भी हो रहे हैं।
हमारी सोच हैं कि "हमें क्या मतलब हैं" । बस इसी में उलझ कर रह गई हैं । बेशक यह सच किसी को कड़वा लग सकता हैं लेकिन हर समाज की हकीकत यही हैं ।
👉🏻25 वर्ष के बाद लड़कियां ससुराल के माहौल में ढल नहीं पाती हैं, क्योंकि उनकी आदतें पक्की और मजबूत हो जाती हैं अब उन्हें मोड़ा या झुकाया नहीं जा सकता जिस कारण घर में बहस, वाद-विवाद, तलाक होता हैं,बच्चे सिजेरियन ऑपरेशन से होते हैं,...जिसके कारण बाद में बहुत सी बिमारी का सामना करना पड़ता हैं ।
👉🏻शादी के लिए लड़की की उम्र 18 साल व लड़के की उम्र 21 साल होनी चाहिए ये तो अब बस आंकड़ों में ही रह गया हैं । एक समय था जब संयुक्त परिवार के चलते सभी परिजन अपने ही किसी रिश्तेदार व परिचितों से शादी-संबंध बालिग होते ही करा देते थे । मगर बढ़ते एकल परिवारों ने इस परेशानी को और गंभीर बना दिया हैं ।
अब तो स्थिति ऐसी हो गई हैं कि एकल परिवार प्रथा ने आपसी प्रेम व्यवहार ही खत्म सा कर दिया हैं । अब तो शादी के लिए जांच पड़ताल में और कोई तो नेगेटिव करें या न करें पर अपने ही खास सगे-संबंधी या जान-पहचान वाले उसे नेगेटिव कर, बनते सम्बंध को बिगाड़ देते हैं ।
👉🏻उच्च शिक्षा और हाई जॉब - बढ़ा रही हैं उम्र..
यूं तो शिक्षा शुरू से ही मूल आवश्यकता रही हैं लेकिन पिछले डेढ़-दो दशक से इसका स्थान उच्च शिक्षा या कहे कि कमाने वाली डिग्री ने ले लिया हैं । इसकी पूर्ति के लिए अमूमन लड़के की उम्र 23-24 या अधिक हो जाती हैं । इसके दो-तीन साल तक जॉब करते रहने या बिजनेस करते रहने पर उसके संबंध की बात आती हैं । जाहिर से इतना होते-होते लड़के की उम्र तकरीबन 30 के इर्द -गिर्द हो जाती हैं । इतने तक रिश्ता हो गया तो ठीक, नहीं तो लोगों की नजर तक बदल जाती हैं । यानि 50 सवाल खड़े हो जाते हैं ।
👉🏻चिंता देता हैं उम्र का यह पड़ाव...
प्रकृति के हिसाब से 30 प्लस का पड़ाव चिंता देने वाला हैं । न केवल लड़के-लड़की को बल्कि उसके माता-पिता, भाई-बहन, घर-परिवार और सगे-संबंधियों को भी । सभी तरफ से प्रयास भी किए, बात भी जच गई लेकिन हर संभव कोशिश के बाद भी रिश्ता न बैठने पर उनकी चिंता और बढ़ जाती हैं । इतना ही नहीं, शंका-समाधान के लिए मंदिरों तक गए, पूजा-पाठ भी कराए, नामी विशेषज्ञों ने जो बताए वे तमाम उपाय भी कर लिए पर बात नहीं बनती । मेट्रीमोनी वेबसाइट्स व वाट्सअप पर चलते बायोडेटा की गणित इसमें कारगार होते नहीं दिखाई देते ।
 👉🏻बिना किसी बिचौलिए के संबंध होना मुश्किल ही होता हैं - मगर कोई बिचौलिया बनना चाहता ही नहीं हैं ।
मगर इन्हें कौन समझाए की जब हम किसी के बिचौलिए नहीं बनेंगे तो हमारा भी कोई नहीं बनेगा । एक समस्या ये भी हम पैदा करते जा रहे हैं कि हम सामाजिक न होकर एकांतवादी बनते जा रहे हैं ।
👉🏻आखिर कहां जाए युवा मन...?
अपने मन को समझाते-बुझाते युवा आखिर कब तक भाग्य भरोसे रहेगा..? अपनों से तिरस्कृत और मन से परेशान युवा सब कुछ होते हुए भी अपने

 को ठगा सा महसूस करता हैं । हद तो तब हो जाती हैं जब किसी समारोह में सब मिलते हैं और एक दूसरे से घुल मिलकर बात करते हैं लेकिन उस वक्त उस युवा पर क्या बीतती हैं , यह वही जानता हैं । ऐसे में कई बार नहीं चाहते हुए भी वह उधर कदम बढ़ाने को मजबूर हो जाता हैं जहां शायद कोई सभ्य पुरूष जाने की भी नहीं सोचता या फिर ऐसी संगत में बैठता हैं जो बदनाम ही करती हो ।
👉🏻ख्वाहिशें अपार, अरमान हजार...
हर लड़की और उसके पिता की ख्वाहिश से आप और हम अच्छी तरह परिचित हैं। पुत्री के बनने वाले जीवनसाथी का खुद का घर हो, कार हो, परिवार की जिम्मेदारी न हो, घूमने-फिरने और आज से युग के हिसाब से शौक रखता हो और कमाई इतनी तगड़ी हो कि सारे सपने पूरे हो जाएं, तो ही बात बन सकती हैं ।
हालांकि सभी के अरमान/सपने  ऐसे नहीं होते लेकिन चाहत सबकी यही हैं । शायद हर लड़की वाला यह नहीं सोचता कि उसका भी लड़का हैं तो, क्या मेरा पुत्र किसी और के लिए यह सब पूरा करने में सक्षम हैं...???
यानि एक गरीब बाप भी अपनी बेटी की शादी एक अमीर लड़के से करना चाहता हैं और अमीर लड़की का बाप तो अमीर से करेगा ही । ऐसे में सामान्य परिवार के लड़के का क्या होगा ? यह एक चिंतनीय विषय सभी के सामने आ खड़ा हुआ हैं । संबंध करते वक्त एक दूसरे का व्यक्तिव व परिवार देखना चाहिए ना कि पैसा ।
👉🏻 कई ऐसे रिश्ते भी हमारे सामने हैं कि जब शादी की तो लड़का आर्थिक रूप से सामान्य ही था मगर शादी बाद वह आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो गया । ऐसे भी मामले सामने आते हैं कि शादी के वक्त लड़का बहुत अमीर था और अब स्थिति सामान्य रह गई । इसलिए लक्ष्मी तो आती जाती हैं ये तो नसीबों का खेल मात्र हैं ।
👉🏻क्यों नहीं सोचता समाज
समाजसेवा करने वाले लोग आज अपना नाम कमाने के लिए लाखों रुपए खर्च करने से नहीं चूकते लेकिन बिडम्बना हैं कि...हर समाज में बढ़ रही युवाओं की विवाह की उम्र पर कोई चर्चा करने की व इस पर कार्य योजना बनाने की फुर्सत किसी को नहीं हैं । कहने को हर समाज की अनेक संस्थाएं हैं वे भी इस गहन बिन्दु पर चिंतित नजर नहीं आती ।
इस मुद्दे पर समाज में पहले कभी चर्चा हुई हो लेकिन उसका ठोस समाधान अभी नजर नहीं आता । तो क्यों नहीं बीड़ा उठाएं कि एक मंच पर आकर ऐसे लड़कों व लड़कियों को लाएं जो बढ़ती उम्र में हैं और समझाइश से उनका रिश्ता कहीं करवाने की पहल करें । यह प्रयास छोटे स्तर से ही शुरू हो ।
अत:भारत का हर समाज के नेतृत्वकर्ताओं से अनुरोध हैं कि वे इस गंभीर समस्या पर चर्चा करें और एक ऐसा रास्ता तैयार करें जो युवाओं को भटकाव के रास्ते से रोककर विकास के मार्ग पर ले जा सकें । स्वार्थ न समझकर परोपकार समझ कर सहयोग करें