प्राचीन युग से ही काशी, - Bhaskar Crime

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प्राचीन युग से ही काशी,

भारत के प्राचीनतम शहर काशी में स्थित है बाबा विश्वेश्वर नाथ का धाम।
शहर का इतिहास जितना पुराना है उतनी ही पुरानी है इस ज्योतिर्लिंग की कथाएं। स्कंद पुराण के काशी खंड में श्री काशी विश्वनाथ धाम का जिक्र आता है, जो कि लगभग 2500 वर्ष प्राचीन है।

इतिहास

प्राचीन युग से ही काशी, सनातन का केंद्र रहा है जहां भारतवर्ष के प्रत्येक स्थान से श्रद्धालु आते थे।
1194 ईस्वी में मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने कन्नौज के राजा को हराकर काशी में स्थित प्राचीन विश्वनाथ धाम को खंडित कर दिया। जिसे गुजरात के एक व्यापारी ने पुनः इल्तुतमिश के शासनकाल के दौरान बनवाया, किंतु 15 वी शताब्दी के अंत में सिकंदर लोदी के शासनकाल में मंदिर को दोबारा तोड़ दिया गया। राजा टोडरमल ने अकबर के शासन काल में पुनः मंदिर बनवाया। इस निर्माण में अकबर ने राजा टोडरमल की आर्थिक रूप से सहायता की।
किंतु अकबर की परपोते औरंगजेब के शासनकाल में सन् 1669 में श्री काशी विश्वनाथ धाम को पुनः तोड़ा गया। तथा यह जानते हुए कि मंदिर को इस स्थान पर दोबारा खड़ा किया जा सकता है, उसने मंदिर की दीवारों पर एक मस्जिद के गुंबद का निर्माण करवा दिया।
मंदिर में ही ज्ञानवापी नाम का एक कुआं स्थित था जिसके जल से प्रतिदिन ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया जाता था। मंदिर के प्रमुख महंत ने ज्योतिर्लिंग के साथ कुएं में छलांग लगा दी तथा उसके पश्चात ज्योतिर्लिंग तथा महंत का कुछ पता नहीं चला। औरंगजेब ने इसी कुएं के आधार पर मस्जिद का नाम ज्ञानवापी मस्जिद रख दिया जो कि आज भी काशी में स्थित है।

तत्पश्चात मराठा राजा मल्हार राव होलकर तथा जयपुर के महाराजा आदि ने मंदिर का पुनः निर्माण करवाने का प्रयास किया किंतु कई कारणों से वे सफल ना हो सके।
अंत में मल्हार राव होलकर की पुत्रवधू इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर जी ने 1780 में काशी विश्वनाथ धाम के समीप ही नए मंदिर का निर्माण करवाया जिसे आज हम और आप देख सकते हैं।

कालांतर में अनेक राजाओं ने मंदिर के निकट  अन्य अनेकों मंदिरों के निर्माण करवाए। जिनमें नेपाल के राजा द्वारा 7 फुट की नंदी प्रतिमा उल्लेखनीय है। जिसका मुख आज भी प्राचीन विश्वनाथ मंदिर की ही ओर है।
 सन 1835 में सिख महाराजा रणजीत सिंह जी ने 1 टन सोने का दान देकर मंदिर के तीनों शिखरों को सोने के पत्रों से ढका।

इसके अतिरिक्त 1940 में घनश्याम दास बिरला जी द्वारा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के परिसर में बनाया गया शिव मंदिर, न्यू काशी विश्वनाथ मंदिर भी कहा जाता है यह मंदिर अपने विशाल आकार के लिए प्रसिद्ध है।

महत्व
हिंदू धर्म में काशी विश्वनाथ का उतना ही महत्व है जितना चेहरे पर नाक का । आदि शंकराचार्य से लेकर गुरु नानक देव तथा तुलसीदास से लेकर स्वामी विवेकानंद तक हमारी संस्कृति के अनेक महान देव पुरुषों ने यहां दर्शन किए हुए इसकी महत्ता को स्वीकार किया है।
गंगा स्नान के पश्चात काशी विश्वनाथ का दर्शन प्रत्येक सनातनी का स्वप्न है।
मंदिर के आसपास अनेकों मंदिर कथा अन्य ऐतिहासिक इमारतें उपलब्ध है, जो आपको बरबस ही हमारी संस्कृति की ओर खींचेंगी।

यदि आप हमारी संस्कृति के प्राचीन गौरव को अनुभव करना चाहते हैं तो जीवन में एक बार काशी दर्शन का लाभ अवश्य लें l