प्रधानमंत्री के नाम बढ़ती महंगाई को लेकर राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ द्वारा कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा - Bhaskar Crime

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प्रधानमंत्री के नाम बढ़ती महंगाई को लेकर राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ द्वारा कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा

देश को खिलाने वाले किसान-मजदूर आज स्वयं भूखे हैं,कर्ज़ में डूबे हैं और डूबते जा रहे है 

 राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ, महाकौशल प्रान्त (म.प्र.), द्वारा प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा

तीन नए कृषि क़ानून के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन चलाया जा रहा है। 


         भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के पूर्व  जनता से किये वादे "बहुत हुई महँगाई की मार

 अब की बार मोदी सरकार" का स्मरण कराते हुए हम ये मांग करते हैं 

इस बढ़ती हुई बेलगाम महँगाई पर त्वरित रोक लगाई जाय अन्यथा हम आंदोलन करने बाध्य होंगे ।

जबलपुर /संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले देश के 550 किसान संगठनों द्वारा विगत वर्ष से भारतीय कृषि एवं कृषकों को कम्पनी राज के हवाले करने वाले तीन नए कृषि क़ानून के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन चलाया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आज देश के हर 10 में से 7 किसान परिवार की आमदनी उसके ख़र्चों से कम है। देश की आधी से ज़्यादा आबादी (58%) कृषि पर निर्भर है। पर देश की कुल कमाई में इनका हिस्सा मात्र 16% है ।


देश को खिलाने वाले किसान-मजदूर आज स्वयं भूखे हैं,कर्ज़ में डूबे हैं और डूबते जा रहे है परन्तु अत्यंत खेद का विषय है कि हमारी केंद्रीय सरकार मूकबधिर बनकर आंखों देखी समस्याओं से मुँह मोड़कर कार्पोरेट घरानों के भविष्य को सँवारने में व्यस्त है। जिसके दुष्परिणाम हम सभी के सामने बेलगाम महंगाई  पेट्रोल-डीजल-गैस यहाँ तक की खाने का मीठा तेल तक में  दुगुनी कीमत हो चुकी है , गिरती हुई अर्थव्यवस्था और विश्व में घटती हुई शाख दिखाई दे रही है।

               एक ओर बढती महंगाई से लगातार बढ़ रहे खर्चें, दूसरी ओर घटती आमदनी के बीच दबे देश के किसान-मजदूर, आम नागरिक जब अपने हकों और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं तो उन्हें भयानक दमन का सामना करना पड़ रहा है । देश के नागरिक 26 जून 1975 के आपातकाल के बाद आज फिर एक अघोषित आपातकाल का सामना कर रहे हैं। लोकतंत्र पर हो रहे हमले का एक उदाहरण कृषि-विरोधी  तीन नए काले क़ानून हैं, जो किसान-मजदूरों पर थोपे जा रहे हैं । इसलिए आज देशभर के किसान-मजदूर आम नागरिक पीड़ित जन बेलगाम महँगाई के विरोध में गाँव-गाँव सड़कों-चौक-चौराहों सहित जिला मुख्यालय में विरोध प्रदर्शन कर  महँगाई विरोधी नारों के साथ अपनी जायज एवं बुनियादी मांगो के साथ आंदोलनरत हो रहे हैं। एक बार फिर तीनों कृषि कानूनों का विरोध करते हुए, देशभर के किसान-मजदूरों के साथ एकजुट होकर, हम आपसे मांग करते हैं कि -


1.बेलगाम महँगाई पर त्वरित रोक लगाई जाए। ताकि देश की 70%गरीब-मध्यम वर्ग के लोग जो स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं उससे निजाद मिल सके।

2. तीनों कृषि विरोधी कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए इनको रद्द किया जाए। तीन नए कृषि कानूनों के माध्यम से सरकार किसानों पर व्यापारियों और कंपनियों के शिकंजे को और भी मज़बूत बना रही है और उनके मुनाफाखोरी को कानूनी समर्थन दे रही है । जिस अँग्रेज़ कंपनी राज से किसान मजदूरों ने लड़कर कृषि में आज़ादी हासिल की, आज वही आज़ादी एक बार फिर ‘अंतर्राष्ट्रीय कंपनी राज’ को सौंपी जा रही है । क्या यही 'आत्मनिर्भरता' है ? सर्वोच्च अदालत द्वारा तीनों कानूनों पर रोक लगाई है तो भी FCI के गोदामों की नीलामी क्यों हो रही है ? क्या बिल गेट्स फॉउंडेशन को म.प्र. के कुछ गाँवों में खेती के ठेका प्रयोग के लिए बुलावा दिया है? हमें यह नामंजूर है।

3. न्यूनतम समर्थन मूल्य, फसल की कुल लागत का डेढ़ गुना (सी 2+50℅) दाम पर निर्धारित किया जाए एवं समर्थन मूल्य पर सभी फसलों की खरीद की कानूनी गारंटी दी जाए। किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग) की सिफारिश के बावजूद आज तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) फसल की कुल लागत का डेढ़ गुना कर सुनिश्चित नहीं किया गया है। देश के अधिकांश किसान मंडी व्यवस्था सुलभ न होने के कारण, आज तक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल बेचने के अपने अधिकार से वंचित रहे हैं। सरकार का दायित्व बनता है कि किसान-मजदूरों को अपनी मेहनत का पूरा दाम (लागत का डेढ़ गुना दाम) सुनिश्चित करने हेतु क़ानून पारित करे ।

4. मंडी व्यवस्था दुरुस्त की जाए।  प्रदेश में मंडियों की भारी कमी है। किसान आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार म.प्र.में 3850 कृषि मंडी होनी चाहिए पर अभी 567 ही हैं। अधिकांश जिलों में केवल 1-2 मंडी ही हैं ।  किसानों को 30-40 किलोमीटर दूर स्थित मंडियों में जाना संभव नहीं है, जिसके चलते अधिकांश किसानों को मंडी व्यवस्था का लाभ नहीं मिला है। मंडियों को दुरुस्त कर सभी किसानों को मंडी व्यवस्था का अधिकार सुनिश्चित करने के बजाए इस व्यवस्था को और भी कमजोर कर किसानों को अपनी फसल कम दामों में बेचने पर मजबूर करना चाहती है जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं । हम मांग करते हैं कि  सभी जिलों में हर 10-20 किलोमीटर में तथा न्यूनतम हर ब्लॉक व तहसील में एक कृषि मंडी स्थापित की जाए एवं मंडी व्यवस्था को दुरुस्त कर समय पर फसल खरीदी का भुगतान सीजन अंत होने से पहले अतिशीघ्र किया जाना सुनिश्चित किया जाए ।

4. सभी 24 फसलों की सरकारी खरीद सुनिश्चित की जाए एवं राशन व्यवस्था में गेहूं चावल के अलावा अन्य खाद्यान्न भी वितरित किए जाएं । कोरोना काल में सभी पात्रता रख रहे परिवारों में प्रत्येक व्यक्ति को प्रति माह 14 किलो अनाज सुनिश्चित किए जाए जिसमें दलहन, तिलहन एवं मक्का, ज्वार जैसे अन्य पौष्टिक अनाज भी वितरित किए जाएं। कोरोना काल के अनुभव ने एक मजबूत राशन वितरण प्रणाली के महत्त्व को पुनः स्थापित किया है, परन्तु नए कृषि क़ानून इस देश के आम जनता के भोजन के अधिकार पर सीधा हमला है। नए कानूनों के माध्यम से व्यापारियों और अन्तराष्ट्रीय कंपनियों के ऊपर से जमाखोरी की सभी रोक हटा दी गई है। सरकारी खरीदी घटने एवं व्यापारियों की जमाखोरी के चलते देश का पूरा खाद्यान्न कंपनियों एवं व्यापारियों के नियंत्रण में जाएगा यह कैसी आत्मनिर्भरता है ? हम इसका विरोध करते हैं ।

5. सोयाबीन बीज की कृत्रिम कमी एवं खुलेआम कालाबाजारी एवं मुनाफाखोरी पर तत्काल रोक लगाई जाए। मध्य प्रदेश में वर्तमान में किसानों को सोयाबीन के बीज उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं । बाजार में एक क्विंटल बीज की कीमत 10,000 रुपये तक बताई जा रही है, परन्तु राज्य सरकार द्वारा इस पर कोई भी कार्यवाही नहीं की गई है । सरकार के रवैये से यह स्पष्ट हो रहा है कि सरकार कृषि एवं कृषकों के वास्तविक बुनियादी समस्याओं को छोड़, कंपनी एवं व्यापरियों की मुनाफाखोरी को बढ़ावा देने में  दिलचस्पी रख रही है।

6. बिजली संशोधन बिल 2020 वापस लिया जाए एवं किसानों को 24 घंटे बिजली निरंतर उपलब्ध हो। देश को खिलाने वाला किसान बिजली के लिए रात-रात भर जागने के लिए मजबूर है। ऐसी स्थिति में बिजली जैसे अत्यावश्यक संसाधन को प्राथमिकता से देश के कृषि विकास हेतु उपलब्ध किए जाने के बजाए निजी कंपनियों को मुनाफाखोरी के लिए सौंप देना केवल किसान मजदूर ही नहीं बल्कि सभी आम नागरिकों के साथ धोखा है, जिसे तुरंत खारिज किया जाना चाहिए ।

7. ठेका खेती पद्धति किसानों की लूट का साधन है इसे खारिज किया जाए। कंपनियों की ठगी से परेशान किसानों को ठेका खेती पद्धति आजादी नहीं गुलामी की ओर ढकेलना है। धामनोद, इंदौर, सांची, खरगोन जिले के किसानों की करोड़ों रूपये की उपज लेकर व्यापारी फरार हो गए हैं। प्रदेशभर में किसानों को इसी प्रकार के अनुभव रहे हैं । ठेका खेती को बढ़ावा देना किसानों को लुटेरे व्यापारियों और कंपनियों के हवाले करने जैसा है जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं। धोखाधड़ी के शिकार सभी किसानों को सरकार द्वारा भुगतान किया जाए।

8. फसल बीमा के भुगतान से वंचित किसानों को अतिशीघ्र भुगतान किए जाएं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार किसानों  के साथ नहीं बल्कि बीमा कंपनीयों के साथ खड़ी है। देशभर में निजी बीमा कंपनियों द्वारा 2016 से 2020 के बीच 12,500 रूपए का मुनाफा कमाया गया परन्तु प्रदेश भर में किसानों को आज भी फसल के नुकसान के बाद बीमा राशि उपलब्ध नहीं हुई है। हाल ही में बेतूल जिले में किसानों को बीमा राशि केवल दो रूपए दी गई थी। वर्तमान में 2020 के खरीफ की सोयाबीन की फसल की बीमा राशि अभी तक किसानों को उपलब्ध नहीं की गई है । सूखा, बाढ़ या अन्य किसी वायरस से नुकसान होने पर 3 महीने के भीतर भुगतान करना जरुरी है। बीमा तो जैसे लीगल लूट साबित हो रहा है।

9. कोरोना लाकडाउन में बागवानी, दूध उत्पादन करने वाले किसानों को हुए नुकसान का मुआवजा तत्काल दिया जाए ।

10. . सभी किसानों की सम्पूर्ण कर्जामुक्ति की जाए। बैंकों द्वारा किसानों से जबरन ऋण वसूली पर रोक लगाई जाए । भावांतर और फसल बीमा की बकाया राशि का अविलम्ब भुगतान किया जाए ।

11. नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर बाँध से म.प्र. को कोई लाभ न मिलते हुए- विस्थापितों के पुनर्वास में भी कुछ हजार परिवारों का पुनर्वास बाकि होते हुए बाँध में पानी भरना और आज तक पुनर्वास पूरा न होना अन्याय है। बरगी से लेकर हम समस्त बाँध के विस्थापित किसान, मजदूर, मछुआरों को न्याय नहीं मिला है। पुनर्वास पूरा होने तक जलाशय में पानी का स्तर मर्यादित रखा जाए। महामारी के काल में मध्य प्रदेश द्वारा नर्मदा घाटी के चिंकी-बोरास परियोजना, सांवेर उदवहन सिंचाई परियोजना एवं अपर नर्मदा बांध परियोजना के नाम पर 10 हज़ार 500 करोड़ का कर्जा लिया है । इन तीनों परियोजनाओं को तत्काल रोकने की मांग करते हैं ।

12. वन अधिकार दावेदारों को नियमानुसार पट्टें दिए जाए तथा वन विभाग द्वारा अवैध रूप से बेदखली पर रोक लगाई जाए। मध्य प्रदेश में पीढ़ियों से खेती करते आ रहे लाखों आदिवासी किसान आज भी अपने वन अधिकार पट्टों से वंचित हैं, जिससे न केवल वे मंडी व्यवस्था एवं अन्य किसानों को मिलने वाले लाभों से वंचित है, परन्तु लगातार वन विभाग द्वारा अवैध बेदखली, हिंसा एवं झूठे केसों के कारण प्रताड़ना भी झेल रहे हैं । मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश आदिवासी किसानों को वन अधिकार पट्टे के माध्यम से उनकी खेती एवं वनोपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के बजाए लगातार 37,450 घन किलोमीटर (40%) जंगल को कंपनियों के हाथ में सौंपने के प्रयासों का हम विरोध करते हैं ।

13. . मध्यप्रदेश सरकार द्वारा छतरपुर के बकस्वाहा के 382.131 हेक्टेयर जंगल मे हीरे की खदान के लिए 2 लाख 15 हजार पेड़ काटने की अनुमति दी गई है जिसे निरस्त किया जाए ये पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मनुष्य के साथ अन्याय है ।

14. पेट्रोल, डीजल के बढ़ते दाम पर अतिशीघ्र रोक लगाई जाए। वर्तमान में अन्तराष्ट्रीय बाजार में दाम कम होने के बावजूद केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार पेट्रोल एवं डीजल के दामों में लगातार बढ़ोत्तरी कर आम जनता से अत्याधिक कर की वसूली कर रही है । इसका सीधा असर आम जनता एवं किसानों के बढ़ते हुए खर्चों में दिखाई पड़ रहा है । किसान को अपनी मेहनत का पूरा दाम न मिलना एवं पेट्रोल, खाद बीज के बढ़ते दाम किसानों पर दोहरी मार है, जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं।

15. मध्यप्रदेश में खनन माफियाओं द्वारा अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अवैध उत्खनन पर तत्काल रोक लगाई जाए । इसमें सर्वोच्च अदालत के हरित न्यायाधिकरण के तथा म.प्र. उच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है लेकिन साथ ही नर्मदा  के साथ हर नदी लुप्त होती जा रही है, इसमें राजनेता माफियाओं के साथ हैं ,  इसे तत्काल रोका जाये ।

देश के विधित मुखिया होने के नाते आपसे अनुरोध है कि उक्त मुद्दों के निराकरण के लिए अपने अधीनस्थ भारत सरकार के मंत्रियों , राज्य सरकारों को आवश्यक निर्देश जारी करने का कष्ट करें व किसान, आम जन व देश वासियों को राहत पहुँचाये।  प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपने वाले महाकौशल प्रांतीय अध्यक्ष दीपक पचोरी संतोष राय, आनंद ज्योतिषी, शुभम दुबे, देवेंद्र शुक्ला, अमित पांडे, नरेंद्र शर्मा, अमित जैन, राजेन्द्र सिंह, अजय भटेले, अनिल शिवहरे, विजय रजक, अजय सिंह, संतोष कहार एवं अन्य सदस्यों की उपस्थिति रही।