दोस्त ने दी किडनी, नियम आड़े आए तो हाईकोर्ट तक लड़ी लड़ाई - Bhaskar Crime

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दोस्त ने दी किडनी, नियम आड़े आए तो हाईकोर्ट तक लड़ी लड़ाई

 MP में किडनी देने का ऐसा पहला मामला दोस्त ने दी किडनी, नियम आड़े आए तो हाईकोर्ट तक लड़ी लड़ाई

 परिवार से कोई डोनर नहीं मिला तो जबलपुर के दोस्त ने दी किडनी, नियम आड़े आए तो हाईकोर्ट तक लड़ी लड़ाई



कोर्ट ने मानवीय आधार पर ट्रांसप्लांट की अनुमति दी। साथ ही ट्रांसप्लांट सेंटर के संचालकों को एक महीने के भीतर इसकी सूचना कोर्ट को देने के निर्देश दिए


 जबलपुर-  दोस्त ने दी किडनी, नियम आड़े आए तो हाईकोर्ट तक लड़ी लड़ाई सही कहते हैं खून के रिश्ते से कम नहीं होता दोस्ती का रिश्ता। भोपाल में ऐसे ही दो दोस्तों की कहानी सामने आई है, जिसमें अपनी दोनों किडनी खो चुके भोपाल के एक शख्स को उसके जबलपुर के दोस्त ने अपनी किडनी डोनेट कर नया जीवन दिया है। खून का रिश्ता नहीं था, 

इसलिए किडनी डोनेट करने में उसके सामने कई कानूनी अड़चनें आई, लेकिन सारे नियमों को पार कर उसने हाईकोर्ट की शरण ली।* 

 20 साल पुराना याराना सतीश और पुष्पेन्द्र का एक-दूसरे से 20 साल पुराना नाता है। दोनों के घर जिंसी चौराहे का पास थे। 10 साल पहले पुष्पेंद्र जबलपुर में चले गए, लेकिन सतीश को नहीं भूले। दोनों के बीच रिश्ता ऐसा है कि जब पुष्पेंद्र ने सतीश को किडनी देने का फैसला किया तो उसके परिवार के किसी ने उनका विरोध नहीं किया।

कोर्ट में मिन्नतें की कि मेरे दोस्त की कुछ दिन की जिंदगी बची है। कोई खून के रिश्ते में डोनर नहीं मिल रहा है। अपने भाई जैसे दोस्त को मैं अपनी किडनी देना चाहता हूं। कृपया इजाजत दीजिए। कोर्ट ने मानवीय आधार पर ट्रांसप्लांट की अनुमति दी। साथ ही ट्रांसप्लांट सेंटर के संचालकों को एक महीने के भीतर इसकी सूचना कोर्ट को देने के निर्देश दिए। तब जाकर व्यक्ति का ट्रांसप्लांट हो सका।

*जब पुष्पेंद्र ने कहा- आप मेरे लिए भाई से बढ़कर हो, मैं किडनी दूंगा, यह मेरे लिए चमत्कार से कम नहीं था: सतीश* 

ये कहानी है अशोका गार्डन के सतीश नायक (55) और जबलपुर निवासी पुष्पेंद्र बच्छ (33) की। सतीश को शुगर और बीपी की शिकायत थी। तबीयत लगातार बिगड़ने लगी तो नायक गुजरात के एक अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे। वहां राहत नहीं मिली, तो किसी ने उन्हें मुंबई जाने की सलाह दी। मुंबई में जांच के बाद डॉक्टर ने उन्हें डायलिसिस कराने की सलाह दी।

15 दिसम्बर 2020 से सप्ताह में दो दिन उनका डायलिसिस शुरू हुआ, लेकिन हालात में सुधार नहीं हुआ। मुंबई के एक डॉक्टर ने उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी। सतीश के परिवार वालों ने किडनी देने की इच्छा जताई, लेकिन उन्हें शुगर, बीपी के मरीज होने के कारण डॉक्टरों ने उन्हें मना कर दया। एक दिन अचानक दोस्त पुष्पेंद्र बच्छ का उनके पास फोन आया।

खराब तबीयत का मालूम पड़ा तो पुष्पेंद्र ने कहा कि सतीश भाई आप मेरे लिए भाई से बढ़कर हो, मैं तुम्हें किडनी दूंगा। सतीश के लिए यह चमत्कार से कम नहीं था। वे भोपाल के सिद्धांता रेड क्रॉस हॉस्पिटल पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि डोनर से खून का रिश्ता होना चाहिए। निराश होकर वे जीएमसी की ट्रांसप्लांट डोनेशन कमेटी के पास पहुंचे।

वहां भी उन्हें अनुमति नहीं मिली। थक-हारकर उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली। कोर्ट ने जीएमसी और सिद्धांता रेड क्रॉस को निर्देश दिए थे कि मरीज की किडनी ट्रांसप्लांट करें। जीएमसी की कमेटी ने डोनर और पीड़ित दोनों को बुलाया, लेकिन सवालों के जवाबों से संतुष्ट नहीं होने पर एनओसी देने से मना कर दिया। सिद्धांता रेडक्रॉस ने भी एनओसी नहीं दी। वे दोबारा हाईकोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और दोबारा सिद्धांता निर्देश दिए कि एक महीने के भीतर किडनी ट्रांसप्लांट कर कोर्ट को अवगत कराएं। इसके ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया पूरी हुई।