मां का देहांत होने के बाद प्रश्न था कि मुखाग्नि कौन देगा-बेटी ने निभाया - Bhaskar Crime

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मां का देहांत होने के बाद प्रश्न था कि मुखाग्नि कौन देगा-बेटी ने निभाया

निभाया संतान होने का फर्ज बेटी ने मां को दी मुखाग्नि, 

नारी ने अपने 'प्रियजन' की चिता को अग्नि दी और बाद में सराहना का पात्र भी बनी


आदिवासी समाज की बीटिया बटेसा बाई ने जो किया वे अनुकरणीय है।

 जबलपुर// बेटा-बेटी मेंं अब फर्क नहीं रहा। जो काम बेटा कर सकता है, वही काम बेटी भी कर सकती हैं। काम चाहे घर का हो या घर की चारदीवारी से बाहर का। ऐसा ही एक उदाहरण पेश किया है पडुआ ग्राम पंचायत की बेटी बतेशा ठाकुर ने सामाजिक बंधनों से मुक्त इस आदिवासी बेटी ने संतान होने का फर्ज निभाते हुए अपनी मां को मुखाग्नि दी।

दरअसल ग्रामपंचायत पडुआ के ग्राम पडुआ में रहने वाली बतेसा बाई ठाकुर की मां का सोमवार को निधन हो गया था। बतेसा बाई के भाई तो थे पर मां के अंतिम संस्कार में वह शामिल नहीं हुए। ऐसे में बेटी बटेसा ठाकुर ने पडुआ शमशाान घाट में विधिविधान से अपनी मां का अंतिम संस्कार किया।

जनपद पंचायत जबलपुर के अंर्तगत आने वाली ग्रामपंचायत पडुआ के प्रधान शिव प्रसाद पटेल ने बताया कि समाज की ये अवधारणा है कि अंतिम संस्कार में महिलाएं शामिल नहीं होती। यह तथ्य मौजूदा सदी में अव्यावहारिक हो चला है। सामाजिक, जातीय परंपरा के पक्षधरों के शुरुआती विरोध के बावजूद नारी ने अपने 'प्रियजन' की चिता को अग्नि दी और बाद में सराहना का पात्र भी बनी।

एक मां-बेटी, बहन-पत्नी तारणहार बनी या न बनाई गईं। इसके पीछे तर्क-वितर्क हो सकते हैं। लेकिन जबलपुर की ग्रामपंचायत पडुआ की आदिवासी ठाकुर समाज की बीटिया बटेसा बाई ने जो किया वे अनुकरणीय है। पुत्र होने के बाबजूद बिना पुत्र सेवा कराए बतेसा बाई की मां चल बसी। बीमार माता की सेवा में जुटी बतेसा बाई के सामने मां का देहांत होने के बाद प्रश्न था कि मुखाग्नि कौन देगा? सगे-सौतेले भाइयों के इंतजार करते निढाल हो रही बतेसा बाई ने यह धर्म निभाया। अब ऐसी खबरें सनसनी बनने की बजाए स्वीकारोक्ति बनना चाहिए। देशभर में ऐसी घटनाएं चुनौती दे रही हैं। बदलते परिदृश्य में इस प्रथा पर किसी तरह का बंधन नहीं होना चाहिए।